बेटियों की दिन दहाड़े लाज लुटती द्वार पर
अब भरोसा है नहीं मुझको तो चौकीदार पर
फूल सी बेटी थी उसकी रौंद डाला जिस्म को
खेलती थी वो अकेली साँझ को ही द्वार पर
हैं कहाँ सरकार के हाकिम मुलाज़िम ये सभी
पूँछता हूँ मैं यही बस देश के सरदार पर
धमकियाँ वो दे रहे हैं डाल देंगे जेल में
जिसने भी उँगली उठाई अबकी जो सरकार पर
फूँक कर वो घर हमारा जा रहे हैं देख लो
आज भी हम हैं मगर सच के ही पैरोकार पर
दर्द बेटी का लिखा है बाप के आँसू लिखे
वाह अरहत की ज़रूरत है नहीं अश'आर पर
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