मुझे फिर से मुहब्बत हो गई है
ये कैसी आज वहशत हो गई है
मैं अपने सूर्य को ढलने न दूँगा
अँधेरों से बग़ावत हो गई है
मुहब्बत में तो धोखा खा चुके हैं
मगर फूलों से चाहत हो गई है
उसी का रूप दिखता शा'इरी में
मियाँ ये तो मुसीबत हो गई है
पिता की आँख में आँसू बचे हैं
कि बेटी आज रुख़्सत हो गई है
तुम्हारे होंठ जब होंठों पे आए
मुझे सिगरेट से फ़ुर्सत हो गई है
तुम्हारे शहर में तो शा'इरी से
हमारी यार शोहरत हो गई है
— Prashant Arahat















