nazar manzil pe hai jinki qadam KHud hi badhaate hain | नज़र मंज़िल पे है जिनकी क़दम ख़ुद ही बढ़ाते हैं

  - Prashant Arahat

नज़र मंज़िल पे है जिनकी क़दम ख़ुद ही बढ़ाते हैं
वो चढ़कर आसमानों में सितारे गढ़ के आते हैं

इरादे हर समय उनके सदा ही आग होते हैं
वो लोहा मानकर ख़ुद को ही भट्टी में तपाते हैं

बहुत दुश्वारियाँ होती हैं इनके रोज़ जीवन में
तभी चुपके से जाकर ये कहीं मिलतेमिलाते हैं

समर्पण इस क़दर इनका मुहब्बत में भले धोखा
मिले इनको मगर ये एकतरफ़ा भी निभाते हैं

भरोसा ही नहीं तुझको हमारी इस मुहब्बत पर
तो सुन ज़ालिम निकलकर अब तेरे पहलू से जाते हैं

मुझे मालूम है अरहत बहुत दुख है ज़माने में
तभी अब हम तेरे सजदे में सिर अपना झुकाते हैं

  - Prashant Arahat

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