नज़र मंज़िल पे है जिनकी क़दम ख़ुद ही बढ़ाते हैं
वो चढ़कर आसमानों में सितारे गढ़ के आते हैं
इरादे हर समय उनके सदा ही आग होते हैं
वो लोहा मानकर ख़ुद को ही भट्टी में तपाते हैं
बहुत दुश्वारियाँ होती हैं इनके रोज़ जीवन में
तभी चुपके से जाकर ये कहीं मिलतेमिलाते हैं
समर्पण इस क़दर इनका मुहब्बत में भले धोखा
मिले इनको मगर ये एकतरफ़ा भी निभाते हैं
भरोसा ही नहीं तुझको हमारी इस मुहब्बत पर
तो सुन ज़ालिम निकलकर अब तेरे पहलू से जाते हैं
मुझे मालूम है अरहत बहुत दुख है ज़माने में
तभी अब हम तेरे सजदे में सिर अपना झुकाते हैं
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