ग़ुर्बत को क्यूँँ न मैं भी शरारत का नाम दूँ
आजा तुझे मैं यार मोहब्बत का नाम दूँ
अब फ़िक्र मुझको जान सताए है इस तरह
तुझको गले लगा के तबीअत का नाम दूँ
हर शय सलाम करता हुआ आगे बढ़ गया
क़ुरआन हर्फ़-हर्फ़ तिलावत का नाम दूँ
रमज़ान के महीने में बरकत हुई बहुत
है चाँद ईद का ये इबादत का नाम दूँ
दिल बेचकर हज़ार असरफ़ी के वास्ते
कहता रहा वो शख़्स तिजारत का नाम दूँ
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