जब आईना देखूँ तो मुझ को झटका लगता है

उतरे चेहरों में सब से उतरा अपना लगता है

मैं कोशिश करती हूँ हँसने की बेहद हँसने की
पर जाने क्यूँ होंठों का नक़्शा धोखा लगता है

मैं ने देखी हैं बचपन की मेरी सब तस्वीरें
उन
में मेरे गालों पर गड्ढा उम्दा लगता है

कोई उम्मीदों की इक कैंची पकड़ा दे मुझ को
ये मायूसी का जाला मुझ को उलझा लगता है

जब कोई खटकाता मेरे दिल के दरवाज़े को
तब फिर दिल के ज़ख़्मी होने का डर सा लगता है

जब सब सुलझा होगा जानाँ उस आख़िरी मंज़र में
उस पल मुझ को जीना आएगा ऐसा लगता है

— Bhoomi Srivastava

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