मुक़द्दर ने जिसे पूछा नहीं वो फ़न ही तो हूँ मैं
किसी दर्जी ने फेंका है वही कतरन ही तो हूँ मैं
नुमाइश के लिए जिसकी कभी दरकार होती है
वही त्यौहार में निकला हुआ बर्तन ही तो हूँ मैं
हथेली पर किसी के रख दी जाएगी मेरी क़िस्मत
सो दुनिया के लिए पुश्तैनी इक कंगन ही तो हूँ मैं
जो नज़रों को टिकाए है किसी अपने की दस्तक पर
वही पलकें भिगोती दिख रही जोगन ही तो हूँ मैं
जिसे वो छोड़ कर भी खुश न हो पाया क़यामत तक
उसी की रूह में बैठी हुई उलझन ही तो हूँ मैं
ये खलता है कि मेरी ज़िंदगी कुछ पल की मेहमाँ है
मगर फिर याद आता है यहाँ जबरन ही तो हूँ मैं
Read Full