गहरे ज़ख़्मों को यूँँ हवा कर के
आईना बन के फिर दग़ा कर के
क्या बताओ तुम्हें हुआ हासिल
अपने लोगों को ही गिरा कर के
फिर ज़रूरत से प्यार करता हूँ
ख़्वाहिशों को मैं अधमरा कर के
मैं कभी लौट कर न आऊँगा
अपनी आदत तुम्हें लगा कर के
मेरा क्या मैं तड़प के कर जाऊँ
उस को करना था जो गया कर के
— Amrendra Vishwakarma















