कितनी यादों के दफ़्तर खुल जाते हैं
ख़्वाब तुम्हारे जब मुझ पर खुल जाते हैं
मैं पहले हर गाम पे ठोकर खाता था
मुझ पे अब चेहरे अक्सर खुल जाते हैं
थोड़ा सा तुम वक़्त अगर दो तो देखो
धीरे धीरे लोग बराबर खुल जाते हैं
— Khalid Azad
ख़्वाब तुम्हारे जब मुझ पर खुल जाते हैं
मैं पहले हर गाम पे ठोकर खाता था
मुझ पे अब चेहरे अक्सर खुल जाते हैं
थोड़ा सा तुम वक़्त अगर दो तो देखो
धीरे धीरे लोग बराबर खुल जाते हैं
Other ghazal from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling