raat kaali yaar phir kyun aa gaii hai | रात काली यार फिर क्यूँँ आ गई है

  - Lalit Mohan Joshi

रात काली यार फिर क्यूँँ आ गई है
ये उदासी मुझ
में फिर क्यूँँ छा गई है

काल भी रोने लगा है देख मुझको
दर्द को सूरत मेरी फिर भा गई है

दिल चला जाता कही बेजान रस्ते
ये मुझे ख़ल्वत यक़ीनन खा गई है

क्यूँँ यहाँ मैं अब करूँँ उसपे भरोसा
आँख पर बदली ये काली छा गई है

अब नहीं करता मदद कोई किसी की
ये बुरी आदत कहाँ से आ गई है

अब नहीं कोई हमारा दोस्त है फिर
अब ये तन्हाई 'ललित' को भा गई है

  - Lalit Mohan Joshi

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