ऐ मुस्कुरा दे यार बड़ी देर हो गई
देखे गुल-ए-बहार बड़ी देर हो गई
सूरज भी ढल गया है शगूफ़े भी सो गए
हूँ महव-ए-इंतिज़ार बड़ी देर हो गई
मुझ से न ख़ाल-ओ-ख़द मह-ए-ताबाँ के पूछिए
देखे जमाल-ए-यार बड़ी देर हो गई
करता है ज़िद वो निस्फ़-मुलाक़ात जाने की
कहता है बार-बार बड़ी देर हो गई
मय्यत तो कब की उठ चुकी बीमार-ए-हिज्र की
आने में तुम को यार बड़ी देर हो गई
ओझल हुआ वो आँख से ज़ामी कुछ इस तरह
थमता नहीं ग़ुबार बड़ी देर हो गई
— Parvez Zaami















