कीजिए जो सितम रह गए हैं
और दो चार दम रह गए हैं
कर के वादा-ए-शब वो न आए
तारे ही गिनते हम रह गए हैं
कहने को नेक अब इस जहाँ में
सिर्फ़ अहल-ए-अदम रह गए हैं
देख कर उस की तर्ज़-ए-तबस्सुम
शीश फूलों के ख़म रह गए हैं
आप और बे-वफ़ा बंदा-पर्वर
टूट कर सब भरम रह गए हैं
ज़ोर-ए-हैदर न सिद्क़-ए-अबूज़र
क्या मुसलमान हम रह गए हैं
दिन को दिन शब को शब लिखने वाले
चंद अहल-ए-क़लम रह गए हैं
क्यूँँ नहीं उगता पच्छिम से सूरज
होने को क्या सितम रह गए हैं
आएँ हैं वक़्त-ए-आख़िर वो मिलने
जाने अब क्या सितम रह गए हैं
छेड़ कर क़िस्सा-ए-इश्क़ 'ज़ामी'
बैठे गुम-सुम से हम रह गए हैं
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