कीजिए जो सितम रह गए हैं

और दो चार दम रह गए हैं

कर के वादा-ए-शब वो न आए
तारे ही गिनते हम रह गए हैं

कहने को नेक अब इस जहाँ में
सिर्फ़ अहल-ए-अदम रह गए हैं

देख कर उस की तर्ज़-ए-तबस्सुम
शीश फूलों के ख़म रह गए हैं

आप और बे-वफ़ा बंदा-पर्वर
टूट कर सब भरम रह गए हैं

ज़ोर-ए-हैदर न सिद्क़-ए-अबूज़र
क्या मुसलमान हम रह गए हैं

दिन को दिन शब को शब लिखने वाले
चंद अहल-ए-क़लम रह गए हैं

क्यूँ नहीं उगता पच्छिम से सूरज
होने को क्या सितम रह गए हैं

आएँ हैं वक़्त-ए-आख़िर वो मिलने
जाने अब क्या सितम रह गए हैं

छेड़ कर क़िस्सा-ए-इश्क़ 'ज़ामी'
बैठे गुम-सुम से हम रह गए हैं

— Parvez Zaami

More by Parvez Zaami

Other ghazal from the same pen

See all from Parvez Zaami →

Phool Shayari

Shers of phool.

All Phool Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling