chand lamhon ki iqaamat si hoti hai | चंद लम्हों की इक़ामत सी होती है

  - Parvez Zaami

चंद लम्हों की इक़ामत सी होती है
दुनिया इक वक़्ती सुकूनत सी होती है

आप जब हँसते हैं दौरान-ए-गुफ़्तुगू
ख़ाना-ए-दिल में मसर्रत सी होती है

वो लतीफ़े भी सुनाते हैं इस तरह
जिस तरह वाज़-ओ-नसीहत सी होती है

जब भी सुनता हूँ फ़साना अय्यूब का
मुफ़्लिसी में भी क़नाअत सी होती है

आप के रू-ए-दरख़्शाँ को देख कर
माह-ए-कामिल को भी हैरत सी होती है

ये भी इक तश्ख़ीस है मरज़-ए-इश्क़ की
दर्द में भी एक लज़्ज़त सी होती है

पहले होती थी मोहब्बत भी कोई शय
अब तो जिस्मों की तिजारत सी होती है

ज़ख़्म भी उस के दिए ऐसे लगते हैं
'ज़ामी' जैसे कोई नेमत सी होती है

  - Parvez Zaami

Muskurahat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Parvez Zaami

As you were reading Shayari by Parvez Zaami

Similar Writers

our suggestion based on Parvez Zaami

Similar Moods

As you were reading Muskurahat Shayari Shayari