चंद लम्हों की इक़ामत सी होती है
दुनिया इक वक़्ती सुकूनत सी होती है
आप जब हँसते हैं दौरान-ए-गुफ़्तुगू
ख़ाना-ए-दिल में मसर्रत सी होती है
वो लतीफ़े भी सुनाते हैं इस तरह
जिस तरह वाज़-ओ-नसीहत सी होती है
जब भी सुनता हूँ फ़साना अय्यूब का
मुफ़्लिसी में भी क़नाअत सी होती है
आप के रू-ए-दरख़्शाँ को देख कर
माह-ए-कामिल को भी हैरत सी होती है
ये भी इक तश्ख़ीस है मरज़-ए-इश्क़ की
दर्द में भी एक लज़्ज़त सी होती है
पहले होती थी मोहब्बत भी कोई शय
अब तो जिस्मों की तिजारत सी होती है
ज़ख़्म भी उस के दिए ऐसे लगते हैं
'ज़ामी' जैसे कोई नेमत सी होती है
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