इश्क़ का कुछ सिला दिए होते
क़ब्र पर गुल चढ़ा दिए होते
शे'र अपने मक़ाम तक जाते
आप गर मुस्कुरा दिए होते
पर्दा गर मह-ज़बीं उठा देते
हम ने दीपक बुझा दिए होते
रोज़-ए-महशर हिसाब देना है
कुछ सितम तो गिना दिए होते
यार तस्कीन-ए-क़ल्ब हो जाती
कोई तोहमत लगा दिए होते
कार-गर मेरी मौत हो जाती
चंद आँसू बहा दिए होते
तीन लफ़्ज़ों की बात थी 'ज़ामी'
काश हम लब हिला दिए होते
— Parvez Zaami















