ऐ न जा दिल-नशीन छोड़ के दिल
विनती करता है हाथ जोड़ के दिल
तेरे जाने के बा'द जान-ए-दिल
रख लिया हम ने तो सिकोड़ के दिल
है गुनाह-ए-अज़ीम दिल-शिकनी
ओ ख़ुदारा न जाओ तोड़ के दिल
कुछ न निकलेगा तेरे ग़म के ब-जुज़
देख लेना नहीं निचोड़ के दिल
क्या सुबूत-ए-वफ़ा दें तुझ को हम
पास कुछ भी नहीं है छोड़ के दिल
कैसे 'ज़ामी' कटेगी आज की शब
वो सर-ए-शब गए हैं तोड़ के दिल
— Parvez Zaami















