एक लड़की है मुस्कुराती है
मोजिज़े हुस्न के दिखाती है
रश्क-ए-महताब क्यूँ न उस को कहूँ
शम्स की तरह जग-मगाती है
सोचता हूँ तिरे अलावा तो
ये क़लम मुझ से रूठ जाती है
इक हमीं तो हैं दीद के क़ाबिल
तू हमीं से नज़र चुराती है
खुश-ज़बानी तो फ़र्ज़ है उन पर
जिस किसी को भी उर्दू आती है
'ज़ामी' कैसे न ए'तिबार करें
वो हमारी ही क़स
में खाती है
— Parvez Zaami















