इक गली दरमियान पड़ती है
फिर ख़ुदी दरमियान पड़ती है
कर तो दें तर्क-ए-मय-कशी वाइज़
तिश्नगी दरमियान पड़ती है
जी तो करता है छेड़ लूँ उस को
सादगी दरमियान पड़ती है
दूरियाँ हसरतों से है इतनी
मुफ़्लिसी दरमियान पड़ती है
राह-ए-मुल्क-ए-अदम नहीं आसाँ
ज़िंदगी दरमियान पड़ती है
शौक़-ए-इज़हार तो है पर 'ज़ामी'
दोस्ती दरमियान पड़ती है
— Parvez Zaami















