आप की इल्तिफ़ात है साक़ी
रक़्स में जो हयात है साक़ी
तू तरन्नुम में गाए मेरी ग़ज़ल
मैं कहूँ क्या ही बात है साक़ी
इतनी तो दे कि होश आ जाए
तेरा दिल तो फ़ुरात है साक़ी
साग़र-ए-मय नहीं है हाथों में
हाथ में काइनात है साक़ी
छोड़ कर तेरे मय-कदे को बस
हर जगह ज़ात-पात है साक़ी
मुस्कुरा के तू गर पिलाए तो
एक क़तरा फ़ुरात है साक़ी
पीने का अज्र मिल ही जाएगा
एक तौबा की बात है साक़ी
— Parvez Zaami















