Kabiir
Kabiir
Ghazal

नदी पर गोपियों को जब सताने कृष्ण आते हैं

यशोदा रूठ जाती हैं मनाने कृष्ण आते हैं

मैं जब भी ब्रज में जाता हूँ लबों पर प्यास रखता हूँ
सुना है प्यासे को पानी पिलाने कृष्ण आते हैं

तमन्ना है कि गिर जाऊँ किसी दिन ब्रज की धरती पर
सुना है गर गिरे कोई उठाने कृष्ण आते हैं

सुला दे रात को ग्वाले मुझे तू अपने आँगन में
सुना है रात को माखन चुराने कृष्ण आते हैं

चराऊँ बन के ग्वाला गाय मैं भी ब्रज के खेतों में
सुना है ये यहाँ गय्या चराने कृष्ण आते हैं

अरे रहबर मुझे तू क्यूँ दिखाता राह है ब्रज में
यहाँ तो राह भटके को दिखाने कृष्ण आते हैं

सितमगर से कहा मैं ने सितम की इंतिहा कर दे
सुना है ज़ुल्म बढ़ने पर बचाने कृष्ण आते हैं

चलो जमना किनारे बैठ कर देखूँ सुना है ये
यहाँ पर रासलीला को रचाने कृष्ण आते हैं

— Kabiir

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