Kabiir
Kabiir
Ghazal

माज़ी को अपने भूल जाना है मुझे

अपनों के ख़ातिर मुस्कुराना है मुझे

इक आशियाँ ख़ुद का बनाऊॅं ख़्वाब है
इस ख़्वाब को सच कर दिखाना है मुझे

लौटे न ख़ाली हाथ दर से कोई भी
बस माल-ओ-ज़र इतना कमाना है मुझे

दुनिया है गर कुछ बोलती दो बोलने
कुछ अपनों को बस चुप कराना है मुझे

पहले तकब्बुर तोड़ना है उन का सब
फिर रू उन्हीं के मुस्कुराना है मुझे

ख़त सामने उस के जला कर के सभी
फिर सोग भी उस का मनाना है मुझे

उस का सुकून-ए-क़ल्ब उस से छीन कर
ख़ुद को भी उतना ही सताना है मुझे

कर दे मिरे मौला तू कोई मो'जिज़ा
ख़ुद ही से अब ख़ुद को बचाना है मुझे

गुमनाम बीते ज़िंदगी पर मौत पे
सारे ज़माने को रुलाना है मुझे

— Kabiir

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