Kabiir

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@Poetkabiir

Kabiir shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kabiir's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Shayari
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  • Sher
  • Ghazal

समझ अफ़ज़ल उसे ख़ुद को गिरा ये मान लेते हैं
चुने हैं ख़ुद जिसे ख़ुद से जुदा ये मान लेते हैं

ज़रा तुम सादगी इस मुल्क के लोगों की तो देखो
यहाँ कुर्सी पे कोई हो ख़ुदा ये मान लेते हैं

Kabiir

छान डालीं सब ही धर्मों की किताबें
अब न वाक़िफ़ कौन मज़हब के रहे हम

Kabiir

या-रब कटे है उम्र हिजरत में मिरी
आख़िर कहाँ पे आब-ओ-दाना है मिरा

Kabiir

लगाओ यूॅं सियासत में हमारे क़द का अंदाज़ा
कि जिसका हाथ थामेंगे वहीं मसनद पे बैठेगा

Kabiir

ज़ुल्म-ए-सरीह देख के ख़ामोश ही रहे
इंसानियत के क़त्ल में तुम भी शरीक हो

Kabiir

हर सम्त ख़ुशबू की तरह वो बहता है
वो सिर्फ़ मेरा है मुझे जो कहता है

Kabiir

ज़ुल्म इक ख़ुद पे किए मैं जा रहा हूँ
यूँ-ही बे-मक़्सद जिए मैं जा रहा हूँ

बन गई हैं ज़िंदगी इक ज़हर मेरी
और उस को भी पिए मैं जा रहा हूँ

Kabiir

ख़ुद ही से अक्सर तसव्वुर में मैं बातें करता हूॅं
इस तरह मैं अपनी ज़ाए सारी रातें करता हूॅं

Kabiir

बराबर मक़बरे के दफ़्न हो कर क्या भला होगा
कि उस से सामना जब रोज़-ए-महशर ही तिरा होगा

Kabiir

ज़िंदगी को अपनी यूँ अज़ाब कर के देखा है
मैंने इश्क़ उस से बे-हिसाब कर के देखा है

इल्म था मुझे फ़रेब-कार है वो शख़्स पर
मैंने फिर भी उसका इंतिख़ाब कर के देखा है

Kabiir

था रंगरेज़ी पे तकब्बुर अब्र को अपनी बड़ा
महबूब से मेरे मिला तो पानी-पानी हो गया

Kabiir

क्या ज़रूरत नाज़नीं को ख़ंजरों की
जब 'अता अब्सार दो, रब ने किए हैं

Kabiir

इन लबों के तो गुनाहों की सज़ा मुझ को दे दी है
उन सितम का क्या जो हम पे तेरी नज़रों ने किए हैं

Kabiir

ज़िंदगी मिरी मुल्हिद की तरह बसर यूँ है
हश्र में मिरा तुझ से सामना न हो या रब

Kabiir