
ज़िंदगी को अपनी यूँँ अज़ाब कर के देखा है
मैं ने इश्क़ उस से बे-हिसाब कर के देखा है
इल्म था मुझे फ़रेब-कार है वो शख़्स पर
मैं ने फिर भी उस का इंतिख़ाब कर के देखा है
— Kabiir
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