Kabiir
Kabiir
Ghazal

किसी गोशे में आब-ए-चश्म जा कर के बहाता हूँ

इसी इक ही अदा से दर्द मैं अपना छुपाता हूँ

न समझो ये कि मेरी ज़िंदगी में ग़म नहीं कोई
अलग ये बात है दुनिया के आगे मुस्कुराता हूँ

सुकूँ इस बात का वो हाथ को तब थाम लेता है
कभी भी जब मैं राह-ए-ज़िंदगी में डगमगाता हूँ

चले जाना तुम्हारा खेल जो क़िस्मत का कहते हो
अगर ये खेल है मैं फिर से क़िस्मत आज़माता हूँ

मिरे अश'आर को जो तुम समझते हो किराये के
सुनो मैं शख़्स वो जो इस ग़ज़ल का जन्मदाता हूँ

ज़रुरत ज़ीस्त को जब भी कभी राहत की होती है
कलाम-ए-मीर को तन्हाई में मैं गुनगुनाता हूँ

— Kabiir

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