Kabiir
Kabiir
Ghazal

मोहब्बत में ज़ुलेख़ा सी इबादत कौन करता है

बदन की चाह है सब को मुहब्बत कौन करता है

है तेरे पास गर दौलत तिरे हाथों को चू
मेंगे
अगर हो जेब तेरी ख़ाली इज़्ज़त कौन करता है

रही मजबूरियाँ अपनी वतन छोड़ा था जब हम ने
भला अपनी ख़ुशी से दोस्त हिजरत कौन करता है

हिदायत लोग करते थे ज़माने और थे वो अब
भटक जाए अगर कोई नसीहत कौन करता है

— Kabiir

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