आँखों में जो लहू है ये सौग़ात-ए-यार है
मातम सा चार-सू है ये सौग़ात-ए-यार है
पहचानने से आईने ने कर दिया मना
पूछे है कौन तू है ये सौग़ात-ए-यार है
पहले तो चाहिए थी ये दुनिया तमाम ही
अब कुछ न आरज़ू है ये सौग़ात-ए-यार है
अब तो शरीफ़-ज़ादे के आठों पहर ही बस
लब पर सुबू सुबू है ये सौग़ात-ए-यार है
अहद-ए-वफ़ा पे उसके बहुत नाज़ था तुझे
तन्हा 'कबीर' तू है ये सौग़ात-ए-यार है
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