Kabiir
Kabiir
Ghazal

आँखों में जो लहू है ये सौग़ात-ए-यार है

मातम सा चार-सू है ये सौग़ात-ए-यार है

पहचानने से आईने ने कर दिया मना
पूछे है कौन तू है ये सौग़ात-ए-यार है

पहले तो चाहिए थी ये दुनिया तमाम ही
अब कुछ न आरज़ू है ये सौग़ात-ए-यार है

अब तो शरीफ़-ज़ादे के आठों पहर ही बस
लब पर सुबू सुबू है ये सौग़ात-ए-यार है

अहद-ए-वफ़ा पे उस के बहुत नाज़ था तुझे
तन्हा 'कबीर' तू है ये सौग़ात-ए-यार है

— Kabiir

More by Kabiir

Other ghazal from the same pen

See all from Kabiir →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling