जिसे यही सनद नहीं कि तू मिरा नसीब हो
जहान में न शख़्स कोई मेरे सा नजीब हो
कि सूक़ में शग़फ़ मिरा बिका मिरे ही सामने
ख़ुदा ज़लील यूँ न फिर कभी कहीं ग़रीब हो
शगुफ़्तगी सी ज़िंदगी बना गया उचाट सी
न बेअदील क़िस्म का किसी का भी रक़ीब हो
हाँ हिज्र ने मुझे बना दिया है क़ैस सा ग़बी
हर एक सम्त लग रहा है मिस्ल इक सलीब हो
वफ़ात का है इंतिज़ार अपनी ही कबीर अब
मुराद ये मज़ार उस की क़ब्र के क़रीब हो
— Kabiir















