जब कभी पहले उसे बरता नहीं मैं
क्यूँ भला उस पे यकीं करता नहीं मैं
शख़्सियत के ऐब गर मालूम होते
राज़ दिल के फिर 'अयाँ करता नहीं मैं
याद-ए-माज़ी जो सताता गर न होता
ज़िक्र उस का करने से डरता नहीं मैं
ज़ख़्म दिल पे जो दिए उस दिल-नशीं ने
सब हरे रक्खे कभी भरता नहीं मैं
वा'दा-ए-दीदार इक उस ने किया था
हसरत-ए-दीदार में मरता नहीं मैं
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