Kabiir
Kabiir
Ghazal

कि शायद उस को मेरा प्यार अब अच्छा नहीं लगता

मैं जो कल तक था उस का यार अब अच्छा नहीं लगता

कशीदें था पढ़ा करता कभी मेरी वफ़ा के जो
मुझे कहता तिरा किरदार अब अच्छा नहीं लगता

अरे जो बे-वजह लड़ता कि उस को हम मना लेंगे
सुनो करना उसे तकरार अब अच्छा नहीं लगता

कभी हर शे'र पर हम को ख़ुशी से दाद देता था
उसे तो कोई भी अश'आर अब अच्छा नहीं लगता

कभी जो ढूँढ़ता था इक बहाना हम से मिलने का
हमीं से करना आँखें चार अब अच्छा नहीं लगता

उसे मैं जान से भी प्यारा था जब पास थी दौलत
अभी जो हो गया हूँ ख़्वार अब अच्छा नहीं लगता

हमेशा वक़्त बिगड़ा तो न होगा उस को समझाओ
मैं कह कह कर गया हूँ हार अब अच्छा नहीं लगता

— Kabiir

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