Kabiir
Kabiir
Ghazal

करे तू ग़ैर से गर बात तो मैं सह नहीं पाता

मगर अपने भी दिल की बात तुझ से कह नहीं पाता

तिरी तस्वीर से ज़ाहिर मोहब्बत रोज़ करता हूँ
न जाने क्यूँ तिरे ही सामने मैं कह नहीं पाता

अगर तू दूर हो जाए कभी मेरी नज़र से तो
दिल-ए-नादान मेरा एक पल भी रह नहीं पाता

तिरे हर झूठ को भी मैं हक़ीक़त मान लेता हूँ
किसी भी बात के तेरे मैं तह-दर-तह नहीं जाता

गुज़रती सामने से जब तो ये ही सोचता हूँ मैं
यही है वो ग़ज़ल जो मैं मुकम्मल कह नहीं पाता

— Kabiir

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