ज़ुल्म इक ख़ुद पे किए मैं जा रहा हूँयूँ-ही बे-मक़्सद जिए मैं जा रहा हूँबन गई हैं ज़िंदगी इक ज़हर मेरीऔर उस को भी पिए मैं जा रहा हूँ— Kabiir