किसी गोशे में आब-ए-चश्म जा कर के बहाता हूँ
इसी इक ही अदा से दर्द मैं अपना छुपाता हूँ
न समझो ये कि मेरी ज़िंदगी में ग़म नहीं कोई
अलग ये बात है दुनिया के आगे मुस्कुराता हूँ
सुकूँ इस बात का वो हाथ को तब थाम लेता है
कभी भी जब मैं राह-ए-ज़िंदगी में डगमगाता हूँ
चले जाना तुम्हारा खेल जो क़िस्मत का कहते हो
अगर ये खेल है मैं फिर से क़िस्मत आज़माता हूँ
मिरे अश'आर को जो तुम समझते हो किराये के
सुनो मैं शख़्स वो जो इस ग़ज़ल का जन्मदाता हूँ
ज़रुरत ज़ीस्त को जब भी कभी राहत की होती है
कलाम-ए-मीर को तन्हाई में मैं गुनगुनाता हूँ
ज़ुल्म इक ख़ुद पे किए मैं जा रहा हूँ
यूँ-ही बे-मक़्सद जिए मैं जा रहा हूँ
बन गई हैं ज़िंदगी इक ज़हर मेरी
और उस को भी पिए मैं जा रहा हूँ
ख़ुद ही से अक्सर तसव्वुर में मैं बातें करता हूॅं
इस तरह मैं अपनी ज़ाए सारी रातें करता हूॅं
ज़िंदगी को अपनी यूँ अज़ाब कर के देखा है
मैंने इश्क़ उस से बे-हिसाब कर के देखा है
इल्म था मुझे फ़रेब-कार है वो शख़्स पर
मैंने फिर भी उसका इंतिख़ाब कर के देखा है
इन लबों के तो गुनाहों की सज़ा मुझ को दे दी है
उन सितम का क्या जो हम पे तेरी नज़रों ने किए हैं