Prit
Prit
Sher

जिस्म छलनी हो चुका है रूह घाइल हो चुकी है

प्यार में कान्हा के मीरा कितनी पागल हो चुकी है

तेरे दर्शन की तमन्ना में निकल आई है घर से
ज़हर पी कर प्रेम बरसाए वो बादल हो चुकी है

— Prit

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