वो जैसा कहते हैं उन के जैसा बनना पड़ता है

बच्चों को बहलाने ख़ातिर बच्चा बनना पड़ता है

जो जब चाहे दिल के भीतर आता है फिर जाता है
प्यार में अब बिन दरवाज़े का कमरा बनना पड़ता है

इस दुनिया में रहते - रहते मुझ को ये मालूम हुआ
जैसे भी हो मुँह पर सबके अच्छा बनना पड़ता है

पहले प्यार जो करते थे वो लैला-मजनूँ बनते थे
अब तो प्यार में बाबू,सोना क्या-क्या बनना पड़ता है

एक समुंदर की देखें तो किस को क्या दे सकता है
प्यासों की ख़ातिर तो मीठा दरिया बनना पड़ता है

हो महबूब बड़ा जितना ग़म भी उतना ही देता है
कान्हा से गर प्यार किया तो राधा बनना पड़ता है

उड़ने की चाहत है लेकिन हालत से मजबूर भी हैं
जीवन इक पिंजरा है सब को चिड़िया बनना पड़ता है

एक हाथ में फ़ोटो उस की, एक में टूटा दिल अपना
ग़ज़लें गर कहनी हैं तो फिर मुझ-सा बनना पड़ता है

— Rituraj kumar

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