अहल-ए-नज़र हैं देख के हैरान आज कल
हम हो रहे हैं ख़ुद से पशेमान आज कल
लहजे की गूँज तेरी न पायल का शोर है
ख़ामोशियों में डूबा है दालान आज कल
अब पहले जैसा 'इश्क़ न उल्फ़त न प्यार है
मतलब-परस्त हो गया इंसान आज कल
करवट अजीब ली है ज़माने ने देखिए
बच्चों से डर रहे हैं बुज़ुर्गान आज कल
ईमान अपना बेच के सफ़्फ़ाक के यहाँ
ख़ादिम बने हैं साहिब-ए-इरफ़ान आज कल
जो प्यार बाँटता था वो मोहसिन कहाँ गया
रस्ते पड़े हैं 'इश्क़ के सुनसान आज कल
इस बे-हया जहान में अफ़सोस है 'शजर'
जीते हैं घुट के साहिब-ए-ईमान आज कल
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