करबोबला से रिश्ता-ए-उल्फ़त को तोड़ दूँ
वो चाहता है फ़ितरत-ए-हक़-गोई छोड़ दूँ
ये क़ल्ब मिस्ल-ए-ख़ाना-ए-काबा है दोस्तो
बतलाओ कैसे ख़ाना-ए-काबा को तोड़ दूँ
रंगत निखारने के लिए गुल की गुल पे मैं
ख़ून-ए-जिगर से तर ये गिरेबाँ निचोड़ दूँ
ये ख़्वाब देखा करती हैं हर रोज़ हिज्र के
अच्छा है मेरे हक़ में मैं आँखों को फोड़ दूँ
बस तेरा एहतिराम है जो सर निगूँ हूँ मैं
वरना हवा का रुख़ तो इशारे से मोड़ दूँ
कब तक लिए फिरोगे इसे ऐसे ख़स्ता हाल
लाओ ये अपना टूटा हुआ दिल दो जोड़ दूँ
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