ख़ुदा की मर्ज़ी से वो अर्ज़ की ख़ुराक हुआ
हुआ था ख़ाक से जो ख़ल्क़ फिर से ख़ाक हुआ
ख़ुदा का शुक्र करें आप हज़रत-ए-यूसुफ़
जवानी आई ज़ुलैख़ा पे इश्क़-ए-पाक हुआ
दिमाग़ कुंद नज़र कम सफ़ेद ज़ुल्फ़ें हुईं
तुम्हारे ग़म में गिरेबान-ए-दिल भी चाक हुआ
तमाम 'उम्र बितानी पड़ी रक़ीब के साथ
हमारे साथ में क़िस्सा ये दर्द नाक हुआ
ये कारज़ार-ए-मुहब्बत की इक रिवायत है
जो ज़द में हुस्न की आया वो दिल हलाक हुआ
था ज़र्रा ज़र्रा तो कुछ हैसियत नहीं थी मिरी
मुझे समेटा शजर तो मैं मुश्त-ए-ख़ाक हुआ
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