मैं ख़ुद अपने ही हाथों से क़यामत कैसे ढाऊँगा
सिखाया जिसने है जीना उसे कैसे जलाऊँगा
मुहब्बत पंछियों से मुझको भी हो जाएगी यारो
परिंदों को जब अपनी माँ समझ पानी पिलाऊँगा
माँ तेरे बाद जाने के तेरी जब याद आएगी
तो छत पर बैठ तारों में तेरी सूरत मिलाऊँगा
मिरी ख़ातिर जो सारी 'उम्र भर बुनती रही स्वेटर
उसी के वास्ते इक दिन कफ़न कैसे मैं लाऊँगा
पता है रीत है लेकिन मैं मर जाऊँगा भूखा ही
तेरे जाने पे जब लोगों को मैं खाना खिलाऊँगा
मैं जिसकी जान हूॅं जो जान बनके मुझ
में रहती है
बहा के राख उसकी ख़ुद को घर तक कैसे लाऊँगा
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