दोस्त गर लड़कियाँ नहीं होतीं
ये हसीं वादियाँ नहीं होतीं
हम अगर वक़्त पर सँभल जाते
पाँव में बेड़ियाँ नहीं होतीं
तुम को मालूम ही नहीं शायद
बीवियाँ दासियाँ नहीं होतीं
आप गर इश्क़ में नहीं होते
ख़ून की उल्टियाँ नहीं होतीं
मैं अगर बाँसुरी बजाता नईं
मुन्तज़िर गोपियाँ नहीं होतीं
हम जो आपस में सुल्ह कर लेते
इतनी बर्बादियाँ नहीं होतीं
डोर दातों से काट लेते हैं
पास जब क़ैंचियाँ नहीं होतीं
— Shivsagar Sahar















