हमारी हो रही चारों तरफ़ है किरकिरी शायदख़ुशी से चूम बैठा जब तुम्हारी ओढ़नी शायदकभी बोसा कभी आँसू कभी तन्हाइयाँ देतेइसी से और बढ़ती जा रही है आशिक़ी शायद— Shivsagar Sahar