पहले-पहल तो सिर पे बिठाता ज़रूर है
फिर वक़्त हर किसी को गिराता ज़रूर है
उठते धुएँ से आप भी बच जाइए हुज़ूर
वरना ये घर में आग लगाता ज़रूर है
इक दूसरे के हिज्र में रहने के बावजूद
इक दूसरे को वस्ल सताता ज़रूर है
कहने को इश्क़-विश्क़ से उसको गुरेज़ था
लेकिन उसी से काम चलाता ज़रूर है
होती नहीं है गुफ़्तगू दो तीन साल से
दो तीन साल से वो रुलाता ज़रूर है
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