मुझ को इतना सँभाल दे कोई
शब-ए-ग़म से निकाल दे कोई
मुझ से कहती है मेरी ख़ामोशी
इक नज़र मुझ पे डाल दे कोई
मछलियाँ आ गई मुहाने पर
मेरे हाथों में जाल दे कोई
ग़ालिबन फ़न हो मीर के जैसा
और ऊँचा ख़याल दे कोई
हाल मेरा है जैसे पैरों में
एक ज़ंजीर डाल दे कोई
शेर-गोई में नाम करना है
ज़िक्र-ए-हिज्र-ओ-विसाल दे कोई
राम जी की तरह ही भटका हूँ
मेरी सीते का हाल दे कोई
— Shivsagar Sahar















