पहले ख़ाके में रंग भरना हैफिर तेरे बाल-ओ-पर कतरना हैआपसे इश्क़ हो गया है परमुझ को इस बात से मुकरना हैबद-तमीज़ी मुझे भी आती हैकाम लेकिन नहीं ये करना हैआप सब जाइए हवेली मेंझोपड़ी में मुझे ठहरना हैतू है कुंदन तो आग ही में जलइस से ज़्यादा अभी निखरना है— Shivsagar Sahar