ख़ुद को पहले कँवल बनाना पड़ता है

फिर दलदल में पाँव जमाना पड़ता है

चाहे जितना काम ज़रूरी हो लेकिन
पहले उस का फ़ोन उठाना पड़ता है

आसानी से दाल कहाँ गल पाती है
इश्क़ में ऊँचा मोल चुकाना पड़ता है

वो देवी है ऐसे-कैसे होगी ख़ुश
मंदिर में फल-फूल चढ़ाना पड़ता है

अपनी माँगे हाकिम तक पहुँचानी हो
उस की ख़ातिर शोर मचाना पड़ता है

— Shivsagar Sahar

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