है मिरी आवारगी फ़ाक़ा-कशी सब सेे अलग
जी रहा हूँ इस लिए मैं ज़िन्दगी सब से अलग
दर -ब-दर दिल ढूँढ़ता रहता है जाने क्या पता
घर में सब कुछ है मगर उस की कमी सब से अलग
फूल , पौधे, ज़र्द पत्ती कुछ सुनहरी तितलियाँ
मोड़ सँकरा है मगर तेरी गली सब से अलग
हुस्न से वाक़िफ़ नहीं होना मुझे अच्छी तरह
चाहता हूँ आप की हो सादगी सब से अलग
एक दिन आँखों में आँखें डालकर देखा उसे
दश्त में जैसे लगी प्यासी नदी सब से अलग
वहशतों का सिलसिला हरगिज़ नहीं आगे बढ़े
आए मुझ से कर ले कोई दोस्ती सब से अलग
इश्क़ है इक मसअला जो हल नहीं होता कभी
जीते जी करनी है पड़ती ख़ुद-कुशी सब से अलग
— Shivsagar Sahar















