आँखें बता रही हैं मोहब्बत तुझे भी है
चाहत बता रही है ज़रूरत तुझे भी है
इक रोज़ इस अज़ाब से बाहर निकल गए
उल्फ़त बता रही है अज़ीयत तुझे भी है
हम दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहे मगर
फिर ये ख़बर हुआ कि अदावत तुझे भी है
गर्दन को चूमने का इरादा किया था मैं
फिर होंठ ने कहा कि इनायत तुझे भी है
दो चार दाँव खेल के मालूम ये हुआ
बिल्कुल हमारे जैसे महारत तुझे भी है
— Afzal Sultanpuri















