ज़मीं पर जब हुकूमत हो रही थी
रिसालत की क़यादत हो रही थी
नफ़ा नुकसान समझा जा रहा है
मोहब्बत में तिजारत हो रही थी
सफ़र होता मुकम्मल किस तरह से
मुसलसल जब ख़िलाफ़त हो रही थी
क़बीला लुट गया कोई न आया
कहाँ थे जब अज़ीयत हो रही थी
लगा के आग ख़ुश शैतान इतना
कहा मेरी हिमायत हो रही थी
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