जो ज़ख़्म अब हरा नहीं भरा नहीं
कभी ज़रा सा दर्द है ज़रा नहीं
मेरे क़रीब सिर्फ़ तुम थी और मुझे
तुम्हीं तो चाहिए थी अप्सरा नहीं
न कोई फोन कोई ख़त न राब्ता
ख़ुदा का शुक्र दोस्त तू मरा नहीं
है दौर-ए-इश्क़ और शिकार चाहिए
तो अब किसी से कोई मशवरा नहीं
तू कोई और रास्ता तलाश कर
मैं उन कसौटियों पे अब खरा नहीं
तो क्या मैं उम्र भर रहूँगा मुस्तकिल
तो उस नज़र को कोई आसरा नहीं
— Ankit Yadav















