अंदाज़-ए-मुख़्तलिफ़ हूँ मैं शायद कहा न हो
आँखों में देख लो मिरी गर आइना न हो
जितनी हसीन शाम है उतनी हसीन आप
मैं सोच में हूँ कैसे कोई बेवफ़ा न हो
बनने का तुमको शौक़ है बन जाओ ऐसा रोग
जिसका न फिर इलाज हो जिसकी दवा न हो
मुझको क़ुबूल हैं तिरे रंज–ओ–मलाल–ओ–ग़म
बस तू मिरे रक़ीब से छुप कर मिला न हो
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