मैं अपनी बात रखूँगा इसी कलाम के साथ
गुज़र रही है ये दुनिया भी किस निज़ाम के साथ
वो इस तरह से मेरे साथ पेश आता है
कि पेश आता हो जैसे किसी ग़ुलाम के साथ
हम ऐसे वक़्त में भी सर उठा के चलते हैं
अजब है शौक़ हमें इब्तिदा-ए-शाम के साथ
कहीं जो मोम की सूरत दिखे तो हँस देना
हम आ गए थे जलाने के इंतिज़ाम के साथ
हवा भी रखती है अब फ़ासला हमारे बीच
कि आ मिले थे कभी सारे एहतिराम के साथ
— Ankit Yadav















