agar raqeeb na hote to dost hote aap | अगर रक़ीब न होते तो दोस्त होते आप

  - Amulya Mishra

अगर रक़ीब न होते तो दोस्त होते आप
हमारे शौक़, ख़यालात एक जैसे हैं

  - Amulya Mishra

Dushmani Shayari

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    भुला दो रंग नफ़रत के , तिरंगा हाथ में लेकर
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    हम इस तमीज़ के साथ उस के पास बैठते हैं
    कि जैसे शाह के क़दमों में दास बैठते हैं

    बस एक तू है जिसे दोस्त बोलता हूँ मैं
    वगर्ना साथ में ऐसे पचास बैठते हैं

    मैं इस लिए भी कभी खुल के हँस नहीं पाता
    उदास लोग मिरे आस-पास बैठते हैं

    बिठाते वक़्त मुझे दिल में ये कहा उस ने
    ये वो जगह हैं जहाँ लोग ख़ास बैठते हैं
    Read Full
    Amulya Mishra
    खँगालने हैं मुझे अपने सब से अच्छे शे'र
    जो तुझ को रंग दे ऐसा गुलाल ढूँढना है
    Amulya Mishra
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    सींचे गए जो ज़ख़्म दवा से निखर गए
    ख़ाली हमारे दर से सभी चारागर गए

    मुश्किल है मेरे दिल में तिरे ग़म को ढूँडना
    सागर में ऐसे कितने ही दरिया उतर गए

    मैं इस लिए भी दौड़ में आगे निकल गया
    मेरे हरीफ़ वक़्त से पहले ठहर गए

    आई ख़िज़ाँ तो इश्क़ के मा'नी पता चले
    पत्तों के साथ शाख़ों से कुछ फूल झड़ गए

    लड़कों को लग रही थी मोहब्बत हसीन शय
    मेरी मिसाल दी गई सारे सुधर गए

    जैसे नदी का हश्र समुंदर में गिरना है
    वैसे ये सानहे सभी मुझ पर गुज़र गए

    तुम ही नहीं गए हो मुझे छोड़ कर 'अमूल्य'
    जाओ तुम्हारे जैसे कई लोग मर गए
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    Amulya Mishra

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