अपना पन भी जता नहीं पाया
इक भी रोता हँसा नहीं पाया
सोचने से भले ही कुछ न मिले
सोचता हूँ वफ़ा नहीं पाया
क्या सलीक़े से हिज्र मांगी थी
दिल भी उसका दुखा नहीं पाया
तन्हा रहना नसीब में आया
मैं कभी काफ़िला नहीं पाया
लाख ढूँढा उसे था काफ़िर ने
पर कहीं भी ख़ुदा नहीं पाया
क्या करेगा पता नहीं 'अंबर'
हाल-ए-दिल भी बता नहीं पाया
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